दक्षिण एशिया में डिजिटल डिवाइड को कैसे कम कर रहे हैं? एक व्यापक मार्गदर्शिका

डिजिटल डिवाइड: एक वैश्विक चुनौती और दक्षिण एशिया की परिस्थितियाँ

डिजिटल डिवाइड, या डिजिटल खाई, से तात्पर्य उस असमानता से है जो समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) तक पहुँच, उपयोग और उससे लाभान्वित होने की क्षमता में मौजूद है। यह एक वैश्विक समस्या है, लेकिन दक्षिण एशिया के संदर्भ में इसकी जटिलता और प्रभाव कहीं अधिक गहरा है। दक्षिण एशिया क्षेत्र, जिसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान शामिल हैं, दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी का घर है। यहाँ पर डिजिटल डिवाइड केवल इंटरनेट कनेक्शन की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लिंग, आय, भूगोल, शिक्षा और डिजिटल साक्षरता जैसे कई स्तरों पर विद्यमान है। अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) के 2023 के आँकड़ों के अनुसार, दक्षिण एशिया में इंटरनेट प्रवेश दर लगभग 47% है, जो वैश्विक औसत 67% से काफी नीचे है। इस क्षेत्र में डिजिटल समावेशन को बढ़ावा देना न केवल आर्थिक विकास के लिए, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए भी एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता है।

डिजिटल डिवाइड के प्रमुख आयाम: पहुँच, उपयोग और परिणाम

दक्षिण एशिया में डिजिटल डिवाइड को समझने के लिए इसके तीन प्रमुख आयामों को देखना आवश्यक है। पहला है पहुँच (Access) का आयाम, जिसमें बुनियादी ढाँचे, उपकरणों की उपलब्धता और किफायतीता शामिल है। दूसरा है उपयोग (Usage) का आयाम, जो डिजिटल साक्षरता, प्रासंगिक सामग्री की उपलब्धता और भाषाई बाधाओं से जुड़ा है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण है परिणाम (Outcome) का आयाम, यानी इंटरनेट का उपयोग करके वास्तविक लाभ प्राप्त करने की क्षमता, जैसे बेहतर आजीविका, शिक्षा या स्वास्थ्य सेवाएँ।

भौगोलिक और आर्थिक असमानताएँ

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच का अंतर इस क्षेत्र में सबसे स्पष्ट है। भारत में, TRAI (टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के 2023 के आँकड़े बताते हैं कि शहरी इंटरनेट घनत्व 99% के करीब है, जबकि ग्रामीण घनत्व लगभग 55% ही है। पाकिस्तान में, पाकिस्तान टेलीकम्यूनिकेशन अथॉरिटी (PTA) के अनुसार, ब्रॉडबैंड घनत्व शहरी क्षेत्रों में 70% और ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 25% है। नेपाल और भूटान के पहाड़ी इलाकों में भौगोलिक चुनौतियाँ बुनियादी ढाँचे के विस्तार में बड़ी बाधा हैं।

लैंगिक डिजिटल डिवाइड

दक्षिण एशिया में लैंगिक डिजिटल डिवाइड एक गंभीर मुद्दा है। विश्व बैंक के अनुसार, इस क्षेत्र में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के मोबाइल इंटरनेट उपयोग करने की संभावना 70% कम है। बांग्लादेश में यह अंतर काफी चौड़ा है, हालाँकि ग्रामीण विकास संस्थान (BRAC) और a2i जैसे संगठनों के प्रयासों से स्थिति में सुधार आ रहा है। सामाजिक-सांस्कृतिक मानदंड, सुरक्षा की चिंताएँ और आर्थिक निर्भरता इस अंतर के प्रमुख कारण हैं।

बुनियादी ढाँचे का विस्तार: केबल, टावर और उपग्रह

डिजिटल डिवाइड को पाटने की पहली शर्त है भौतिक बुनियादी ढाँचे का निर्माण। दक्षिण एशियाई देश इस दिशा में विविध तकनीकी समाधानों पर निवेश कर रहे हैं।

सबमरीन केबल नेटवर्क और फाइबर ऑप्टिक्स

क्षेत्र की डिजिटल कनेक्टिविटी अंतर्राष्ट्रीय सबमरीन केबल सिस्टमों पर निर्भर करती है, जैसे SEA-ME-WE 4 (दक्षिण-पूर्व एशिया-मध्य पूर्व-पश्चिम यूरोप 4), SEA-ME-WE 5, और AAE-1 (एशिया अफ्रीका यूरोप-1)। भारत ने भारतनेट परियोजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों तक फाइबर ऑप्टिक्स नेटवर्क पहुँचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इसी तरह, श्रीलंका की लंका बेल और बांग्लादेश का বাংলাদেশ হাই-টেক পার্ক अथॉरिटी (बांग्लादेश हाई-टेक पार्क प्राधिकरण) बुनियादी ढाँचे के विकास में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।

मोबाइल टावर और 4G/5G रोलआउट

मोबाइल नेटवर्क ने दक्षिण एशिया में इंटरनेट क्रांति का नेतृत्व किया है। रिलायंस जियो ने भारत में सस्ते 4G डेटा की शुरुआत करके बाजार में बड़ा बदलाव लाया। पाकिस्तान में, जैज़ और टेलीनॉर जैसे ऑपरेटरों ने नेटवर्क का विस्तार किया है। 5G तकनीक की शुरुआत, जैसे भारत में भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया द्वारा, भविष्य की ओर इशारा करती है, हालाँकि इसका लाभ अभी मुख्यतः शहरी केंद्रों तक सीमित है।

उपग्रह और हवाई इंटरनेट सेवाएँ

दुर्गम क्षेत्रों के लिए, उपग्रह-आधारित इंटरनेट एक व्यवहार्य समाधान है। स्पेसएक्स का स्टारलिंक सेवा पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में पहुँचना शुरू कर चुका है। भारत अपनी स्वदेशी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की मदद से और वनवेब जैसी कंपनियों के साथ साझेदारी करके इस दिशा में काम कर रहा है। नेपाल में, नेपाल टेलीकॉम ने दूरदराज के गाँवों में कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए उपग्रह तकनीक का उपयोग किया है।

किफायतीता बढ़ाने के उपाय: डेटा की लागत और सब्सिडी

बुनियादी ढाँचा होने के बाद भी, इंटरनेट सेवाओं की किफायतीता एक बड़ी चुनौती बनी रहती है। दक्षिण एशियाई देशों ने इस मुद्दे से निपटने के लिए कई नीतिगत हस्तक्षेप किए हैं।

भारत में प्रतिस्पर्धा और तकनीकी नवाचार के कारण दुनिया में सबसे सस्ता मोबाइल डेटा उपलब्ध है, प्रति गीगाबाइट की कीमत औसतन 0.17 अमेरिकी डॉलर है। बांग्लादेश सरकार ने डिजिटल বাংলাদেশ के दृष्टिकोण के तहत स्मार्टफोन और इंटरनेट पैकेजों पर करों में छूट दी है। श्रीलंका और नेपाल में भी सार्वजनिक कल्याणकारी योजनाओं के तहत कम आय वाले परिवारों को सब्सिडी दी जाती है। यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (USOF) जैसे तंत्र, जो दूरसंचार कंपनियों से लिए गए अंशदान से बनते हैं, का उपयोग ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में सेवाओं को सब्सिडी देने के लिए किया जाता है।

देश औसत मोबाइल डेटा कीमत (प्रति GB, USD में) मुख्य सब्सिडी/योजना इंटरनेट प्रवेश दर (2023 अनुमान)
भारत 0.17 भारतनेट, USOF ~52%
पाकिस्तान 0.47 डिजिटल पाकिस्तान, USF ~35%
बांग्लादेश 0.53 डिजिटल बांग्लादेश, स्मार्टफोन कर छूट ~43%
श्रीलंका 0.61 लंका सरकार ऑनलाइन, ग्रामीण टेलीसेंटर ~48%
नेपाल 0.85 नेपाल टेलीकॉम रिमोट कनेक्टिविटी ~38%
भूटान 1.20 डिजिटल ड्रुक यल्फा ~65%
मालदीव 3.50 द्वीप कनेक्टिविटी परियोजनाएँ ~70%

डिजिटल साक्षरता और कौशल विकास: शिक्षा का केंद्रीय भूमिका

डिवाइस और कनेक्शन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। लोगों को इंटरनेट का प्रभावी और सुरक्षित उपयोग करने के लिए सशक्त बनाना आवश्यक है। दक्षिण एशिया में डिजिटल साक्षरता अभियानों को राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों और सामुदायिक पहलों के साथ जोड़ा जा रहा है।

स्कूली शिक्षा में एकीकरण

भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कोडिंग और डिजिटल साक्षरता को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है। श्रीलंका में, शिक्षा मंत्रालय ने नानासाला (ज्ञान पादुका) डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है। पाकिस्तान का डिजिटल पाकिस्तान कार्यक्रम युवाओं को प्रौद्योगिकी कौशल प्रदान करने पर केंद्रित है।

वयस्क शिक्षा और सामुदायिक प्रशिक्षण

गैर-सरकारी संगठन और निजी क्षेत्र इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भारत में टाटा ट्रस्ट्स की डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन और गूगल की इंटरनेट साथी जैसी पहलों ने लाखों महिलाओं को डिजिटल साक्षर बनाया है। बांग्लादेश में a2i कार्यक्रम के तहत देश भर में शिक्षा हब और सेवा हब स्थापित किए गए हैं।

सामग्री और सेवाओं का स्थानीयकरण: भाषा और प्रासंगिकता

इंटरनेट की उपयोगिता तब तक सीमित है जब तक उसकी सामग्री उपयोगकर्ता की भाषा और सांस्कृतिक संदर्भ में उपलब्ध न हो। दक्षिण एशिया भाषाई विविधता का एक खजाना है, और इस चुनौती का समाधान करना महत्वपूर्ण है।

भारतीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री का विस्तार

विकिपीडिया ने हिंदी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, उर्दू और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी सामग्री का विस्तार किया है। गूगल की भारतीय भाषाओं के लिए इंटरनेट पहल और माइक्रोसॉफ्ट की भाषा इंटरफेस पैक ने स्थानीयकरण में मदद की है। जियो ने अपने प्लेटफॉर्म जियोसिनेमा पर क्षेत्रीय भाषाओं की सामग्री को बढ़ावा दिया है।

ई-गवर्नेंस और डिजिटल सेवाएँ

सरकारी सेवाओं का ऑनलाइन होना डिजिटल समावेशन को बढ़ावा देता है। भारत का डिजिटल इंडिया कार्यक्रम आधार, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI), और माईगव पोर्टल जैसी सेवाओं का आधार है। बांग्लादेश का शुभो ढाका और पोर्चल ऐप, पाकिस्तान का नाद्रा पोर्टल, और श्रीलंका का ई-डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम नागरिकों को सीधे लाभ पहुँचा रहे हैं।

  • भारत: कोविन पोर्टल (टीकाकरण), डिजिलॉकर (दस्तावेज़ भंडारण), UMANG (बहु-सेवा ऐप)।
  • बांग्लादेश: सुविधा डिजिटल प्लेटफॉर्म, ईक्यू शिक्षा पोर्टल।
  • पाकिस्तान: पाकिस्तान ऑनलाइन वर्क वीजा प्रणाली, ई-तालिमी पोर्टल।
  • श्रीलंका: लंका सरकार ऑनलाइन, ई-थम्मुक भूमि रजिस्ट्री।
  • नेपाल: नेपाल पोर्टल, मेलमची ई-सेवा पहल।

नवाचार और स्टार्टअप इकोसिस्टम: स्थानीय समाधान

दक्षिण एशिया का गतिशील स्टार्टअप इकोसिस्टम डिजिटल समावेशन की चुनौतियों के लिए अद्वितीय समाधान विकसित कर रहा है। ये नवाचार अक्सर स्थानीय संदर्भ को ध्यान में रखते हुए कम लागत और उच्च प्रभाव वाले होते हैं।

भारत में, एग्रीमार्केट और डीहाट जैसे कृषि-तकनीक स्टार्टअप किसानों को बाजार से जोड़ते हैं। मेडिकोवर और प्रैक्टो जैसी स्वास्थ्य सेवा कंपनियाँ टेलीमेडिसिन सेवाएँ प्रदान करती हैं। बांग्लादेश का पैथाओ ऐप स्थानीय भाषा में ऑनलाइन सामग्री का एक बड़ा स्रोत बन गया है। पाकिस्तान में, सादपे और टेलीस्कूल जैसे प्लेटफॉर्म शैक्षिक सामग्री प्रदान करते हैं। नेपाल में, हाम्रो पाठशाला ने ऑनलाइन शिक्षण को बढ़ावा दिया है। वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में, भारत का पेटीएम और बांग्लादेश का bKash मोबाइल वॉलेट सेवाओं ने लाखों लोगों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ा है।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और बहु-हितधारक भागीदारी

डिजिटल डिवाइड एक ऐसी चुनौती है जिसका समाधान कोई एक सरकार या संगठन अकेले नहीं कर सकता। इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और सरकार, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज और अकादमिक जगत के बीच साझेदारी आवश्यक है।

वैश्विक संगठनों की भूमिका

विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया में कई डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए वित्त पोषण प्रदान किया है। अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) तकनीकी मानकों और क्षमता निर्माण में सहायता करता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने डिजिटल एडवोकेसी और नीति सलाह पर काम किया है। एशियाई विकास बैंक (ADB) और विश्व आर्थिक मंच (WEF) भी क्षेत्रीय पहलों में शामिल हैं।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP)

सफलता की कई कहानियाँ पीपीपी मॉडल से उभरी हैं। भारत की भारतनेट परियोजना में निजी कंपनियों की भागीदारी है। फेसबुक (अब मेटा) की फ्री बेसिक्स पहल, हालाँकि विवादास्पद रही, ने सीमित इंटरनेट पहुँच प्रदान की। गूगल की नेक्स्ट बिलियन यूजर्स पहल और माइक्रोसॉफ्ट की एयरबैंड परियोजना ने ग्रामीण कनेक्टिविटी पर केंद्रित शोध को आगे बढ़ाया है।

भविष्य की चुनौतियाँ और उभरती प्रौद्योगिकियाँ

जबकि महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, भविष्य की राह में नई चुनौतियाँ और अवसर मौजूद हैं। इनमें डेटा गोपनीयता और सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की भूमिका, और जलवायु परिवर्तन का डिजिटल बुनियादी ढाँचे पर प्रभाव शामिल है।

5G और 6G जैसी उन्नत नेटवर्क तकनीकें इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और स्मार्ट शहरों को सक्षम बनाएँगी, लेकिन इनके ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचने में समय लगेगा। कम लागत वाले डिवाइस, जैसे जियोफोन की श्रृंखला, महत्वपूर्ण बनी रहेगी। ब्लॉकचेन तकनीक पारदर्शिता बढ़ाने और ई-गवर्नेंस सेवाओं को मजबूत करने में मदद कर सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात, नीतियों को समावेशी और लोग-केंद्रित बने रहना चाहिए, ताकि डिजिटल क्रांति का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सके। दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) जैसे क्षेत्रीय निकायों को डिजिटल एकीकरण को प्राथमिकता देकर सीमा पार सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए।

FAQ

दक्षिण एशिया में डिजिटल डिवाइड का सबसे बड़ा कारण क्या है?

कोई एक कारण नहीं है, बल्कि कारकों का एक जटिल मिश्रण है। इनमें आर्थिक असमानता (उपकरण और डेटा की किफायतीता), भौगोलिक बाधाएँ (पहाड़ी और दूरदराज के इलाके), निम्न डिजिटल साक्षरता, प्रासंगिक स्थानीय भाषा की सामग्री की कमी, और गहरी जड़ें जमाए लैंगिक असमानताएँ शामिल हैं। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच का अंतर विशेष रूप से गहरा है।

डिजिटल डिवाइड को पाटने में सबसे सफल दक्षिण एशियाई देश कौन सा है?

विभिन्न मापदंडों पर अलग-अलग देश अग्रणी हैं। भूटान में उच्च इंटरनेट प्रवेश दर (~65%) है। भारत ने दुनिया में सबसे सस्ता मोबाइल डेटा उपलब्ध कराकर और यूपीआई जैसे डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म के माध्यम से बड़े पैमाने पर डिजिटल समावेशन हासिल किया है। बांग्लादेश ने डिजिटल बांग्लादेश पहल के तहत ई-सेवाओं के विस्तार में उल्लेखनीय प्रगति की है। सफलता को केवल कनेक्शन के आँकड़ों से नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव से मापा जाना चाहिए।

सामान्य व्यक्ति डिजिटल डिवाइड को कम करने में कैसे योगदान दे सकता है?

व्यक्तिगत स्तर पर कई योगदान संभव हैं: परिवार और समुदाय के सदस्यों, विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों और महिलाओं को डिजिटल साक्षर बनाने में मदद करना। स्थानीय भाषाओं में उपयोगी डिजिटल सामग्री बनाना या उसका अनुवाद करना (जैसे विकिपीडिया पर)। डिजिटल स्वच्छता और ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में जागरूकता फैलाना। पुराने लेकिन काम करने योग्य स्मार्टफोन या टैबलेट दान करना जो संगठनों के माध्यम से जरूरतमंदों तक पहुँचाए जा सकें।

क्या केवल तकनीकी बुनियादी ढाँचे पर ध्यान देना पर्याप्त है?

बिल्कुल नहीं। तकनीकी बुनियादी ढाँचा केवल पहला कदम है। समान रूप से महत्वपूर्ण हैं: डिजिटल साक्षरता और कौशल प्रशिक्षण, स्थानीय भाषा में प्रासंगिक सामग्री का निर्माण, डेटा गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली मजबूत नीतियाँ और कानून

ISSUED BY THE EDITORIAL TEAM

This intelligence report is produced by Intelligence Equalization. It is verified by our global team to bridge information gaps under the supervision of Japanese and U.S. research partners to democratize access to knowledge.

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