सार्वभौमिक बेसिक इनकम (यूबीआई) क्या है?
सार्वभौमिक बेसिक इनकम (Universal Basic Income – UBI) एक वित्तीय सहायता का एक मॉडल है, जिसके तहत किसी देश या क्षेत्र की सरकार अपने सभी नागरिकों को, बिना किसी शर्त या कार्य के, एक नियमित और निश्चित राशि प्रदान करती है। इसकी मुख्य विशेषताएं हैं: सार्वभौमिकता (सभी को), निश्चितता (एक तय राशि), नियमितता (मासिक/वार्षिक), और निःशर्तता (बिना किसी शर्त के)। यह अवधारणा पारंपरिक सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों से भिन्न है, जो अक्सर गरीबी रेखा से नीचे के लोगों, बेरोजगारों, या विशिष्ट समूहों तक सीमित होते हैं और उन पर कई शर्तें लगाई जाती हैं।
यूबीआई के सैद्धांतिक आधार
यूबीआई का सिद्धांत विभिन्न दार्शनिक और आर्थिक विचारधाराओं से प्रेरित है। सर थॉमस मोर ने अपनी 1516 की कृति ‘यूटोपिया’ में इसके समान विचार रखे थे। आधुनिक समय में, दार्शनिकों जैसे बेल्जियम के फिलिप वैन पारीज और अर्थशास्त्रियों जैसे मिल्टन फ्रीडमैन (जिन्होंने ‘नकारात्मक आयकर’ का प्रस्ताव रखा) और फ्रेडरिक हायेक ने इसकी वकालत की। भारत में, नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के ‘क्षमता दृष्टिकोण’ को यूबीआई के लिए एक मजबूत आधार माना जाता है, क्योंकि यह लोगों को गरिमा और चुनाव की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
यूबीआई के पक्ष और विपक्ष में तर्क
यूबीआई पर वैश्विक बहस काफी जटिल और बहुआयामी है। इसके समर्थक और विरोधी दोनों ही मजबूत तर्क प्रस्तुत करते हैं।
समर्थन में प्रमुख तर्क
- गरीबी और असमानता में कमी: यह सीधे तौर पर नकदी हस्तांतरण के माध्यम से गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की मदद करता है।
- प्रशासनिक सरलता: कई जटिल सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं (जैसे भारत की PDS) को एक सीधे भुगतान से बदला जा सकता है, जिससे भ्रष्टाचार और रिसाव कम हो।
- तकनीकी बेरोजगारी का समाधान: AI और ऑटोमेशन (रोबोटिक्स) के कारण रोजगार के भविष्य को देखते हुए, यूबीआई लोगों के लिए एक सुरक्षा जाल का काम कर सकता है।
- स्वतंत्रता और गरिमा: यह लोगों को बेहतर जीवन विकल्प चुनने, शिक्षा प्राप्त करने, या छोटा व्यवसाय शुरू करने की आजादी देता है, बिना भुखमरी के डर के।
- अवैतनिक कार्य को मान्यता: यह घरेलू कार्य, बुजुर्गों की देखभाल, और समुदाय सेवा जैसे अवैतनिक कार्यों के आर्थिक मूल्य को स्वीकार करता है।
विरोध में प्रमुख तर्क
- वित्तीय व्यवहार्यता: सभी नागरिकों को नियमित भुगतान करना सरकारों के लिए एक भारी वित्तीय बोझ हो सकता है, जिससे करों में वृद्धि या अन्य जरूरी खर्चों में कटौती हो सकती है।
- काम करने की प्रेरणा में कमी: आलोचकों का मानना है कि मुफ्त पैसा मिलने से लोग काम करना छोड़ देंगे, जिससे अर्थव्यवस्था की उत्पादकता प्रभावित होगी।
- लक्षित सहायता की कमी: अमीरों को भी यह भुगतान मिलेगा, जबकि संसाधनों को सिर्फ जरूरतमंदों तक सीमित रखना अधिक कारगर हो सकता है।
- मुद्रास्फीति का खतरा: अर्थव्यवस्था में नकदी की अचानक बढ़ोतरी से वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे यूबीआई का लाभ कम हो जाएगा।
- सामाजिक सुरक्षा ढांचे का क्षरण: इससे मौजूदा और अधिक लक्षित सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम (जैसे बेरोजगारी भत्ता, विकलांगता लाभ) खत्म हो सकते हैं।
वैश्विक संदर्भ: विभिन्न देशों में यूबीआई प्रयोग
पिछले कुछ दशकों में, दुनिया भर के कई देशों और क्षेत्रों ने यूबीआई या उससे मिलते-जुलते नकद हस्तांतरण कार्यक्रमों के छोटे पैमाने के प्रयोग किए हैं। इन प्रयोगों का उद्देश्य वास्तविक दुनिया में इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को समझना रहा है।
उत्तर अमेरिका और यूरोप के प्रयोग
कनाडा ने 1970 के दशक में ‘मिनकॉम’ (Mincome) प्रयोग चलाया, जो डॉफिन, मैनिटोबा शहर में था। हाल के वर्षों में, ओंटारियो प्रांत ने भी एक प्रयोग शुरू किया था, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया। संयुक्त राज्य अमेरिका में, अलास्का राज्य का अलास्का परमानेंट फंड एक प्रकार का सीमित यूबीआई है, जो तेल राजस्व से सभी निवासियों को वार्षिक लाभांश देता है। फिनलैंड ने 2017-2018 में एक राष्ट्रीय स्तर का यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण किया, जिसमें बेरोजगारों को निःशर्त राशि दी गई। नीदरलैंड्स के शहरों जैसे उट्रेच और वागेनिंगन ने भी सीमित प्रयोग किए।
लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में प्रयोग
ब्राजील ने बोल्सा फैमिलिया जैसे कार्यक्रमों के साथ नकद हस्तांतरण में अग्रणी भूमिका निभाई है, हालांकि यह पूर्ण यूबीआई नहीं है। केन्या में, गैर-लाभकारी संगठन ‘गिवडायरेक्टली’ (GiveDirectly) ग्रामीण गांवों में दीर्घकालिक यूबीआई प्रयोग चला रहा है, जो इसके प्रभावों पर सबसे बड़े अध्ययनों में से एक है। ईरान ने 2011 में जीवाश्म ईंधन सब्सिडी को हटाकर एक सार्वभौमिक नकद हस्तांतरण कार्यक्रम लागू किया, जो व्यावहारिक रूप से एक यूबीआई था। भारत में, सेंटर फॉर बजट एंड पॉलिसी स्टडीज और यूनिसेफ के सहयोग से मध्य प्रदेश के कुछ गांवों में 2010-2011 में एक महत्वपूर्ण पायलट परियोजना चलाई गई थी।
प्रमुख प्रयोगों के परिणाम और निष्कर्ष
विभिन्न प्रयोगों से प्राप्त आंकड़ों और रिपोर्टों ने यूबीआई के प्रभावों पर की गई कई धारणाओं को चुनौती दी है और नई अंतर्दृष्टि प्रदान की है।
स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक गतिविधि पर प्रभाव
अधिकांश प्रयोगों में पाया गया कि निःशर्त नकदी लेने वालों ने काम करना नहीं छोड़ा। फिनलैंड के प्रयोग में पाया गया कि प्राप्तकर्ताओं की रोजगार स्थिति में कोई महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभाव नहीं था, लेकिन उनकी मानसिक भलाई, तनाव का स्तर और जीवन संतुष्टि में सुधार हुआ। केन्या के गिवडायरेक्टली प्रयोग में पाया गया कि लोगों ने पैसे का उपयोग उत्पादक निवेश जैसे छोटे व्यवसाय शुरू करने, पशुधन खरीदने और घरों की मरम्मत करने में किया। भारत के मध्य प्रदेश के प्रयोग में बाल पोषण, स्कूल नामांकन (खासकर लड़कियों का) और सामाजिक स्तरीकरण में सुधार देखा गया। लोगों ने शराब और तंबाकू जैसी ‘विलासिता’ पर खर्च नहीं बढ़ाया, जो एक आम आशंका थी।
वित्तीय सुरक्षा और उद्यमशीलता
नकद हस्तांतरण ने लोगों को आर्थिक झटकों (जैसे बीमारी, फसल खराब होना) को बेहतर ढंग से सहने में मदद की। यह एक ‘वेंचर कैपिटल’ का काम करता है, जिससे लोग जोखिम लेकर नए आर्थिक अवसर तलाश सकते हैं। अलास्का के फंड के अध्ययनों से पता चला है कि इससे बेरोजगारी नहीं बढ़ी और अंशकालिक रोजगार में थोड़ी वृद्धि हुई, क्योंकि लोगों के पास आर्थिक बफर था।
| देश/प्रयोग | अवधि | प्राप्तकर्ता | प्रमुख निष्कर्ष |
|---|---|---|---|
| फिनलैंड यूबीआई प्रयोग | 2017-2018 | बेरोजगार (2000 लोग) | रोजगार में कोई बड़ा बदलाव नहीं; मानसिक स्वास्थ्य, तनाव और जीवन संतुष्टि में सुधार। |
| केन्या (गिवडायरेक्टली) | 2016-अब तक | ग्रामीण गांवों के 20,000+ लोग | आर्थिक संपत्ति, उद्यमशीलता, खाद्य सुरक्षा में वृद्धि; सामाजिक तनाव में कमी। |
| भारत, मध्य प्रदेश | 2010-2011 | 8 गांवों के सभी निवासी | बाल पोषण, स्कूल उपस्थिति, स्वास्थ्य देखभाल में सुधार; उत्पादक निवेश बढ़ा। |
| कनाडा, ‘मिनकॉम’ | 1974-1979 | डॉफिन शहर के निवासी | काम के घंटों में मामूली कमी (मुख्यतः नए माता-पिता और किशोर); अस्पताल में भर्ती होने की दर में कमी। |
| ईरान, सब्सिडी सुधार | 2011-अब तक | लगभग पूरी आबादी | गरीबी में कमी आई; मुद्रास्फीति का असर अस्थायी; सार्वजनिक स्वीकृति अधिक। |
सांस्कृतिक दृष्टिकोण: यूबीआई को अलग-अलग समाज कैसे देखते हैं?
यूबीआई की अवधारणा और स्वीकार्यता दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सांस्कृतिक मूल्यों, सामाजिक ढांचे और ऐतिहासिक अनुभवों से गहराई से प्रभावित है।
पश्चिमी व्यक्तिवाद बनाम सामूहिक समाज
उत्तरी अमेरिका और यूरोप जैसे व्यक्तिवादी समाजों में, यूबीआई को अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्व-निर्णय के साधन के रूप में देखा जाता है। यह ‘अमेरिकन ड्रीम’ की अवधारणा से जुड़ सकता है, जहां हर किसी को सफल होने का एक न्यूनतम मंच मिले। हालांकि, इन्हीं समाजों में ‘कठिन परिश्रम’ (Protestant work ethic) और स्वावलंबन पर जोर भी है, जो निःशर्त सहायता के विचार का विरोध करता है। इसके विपरीत, जापान, दक्षिण कोरिया, या चीन जैसे सामूहिकतावादी समाजों में, सामाजिक सुरक्षा अक्सर परिवार और समुदाय की जिम्मेदारी मानी जाती है। वहां यूबीआई पर चर्चा समाज की सामूहिक भलाई और सामाजिक स्थिरता के लिए इसके योगदान के आसपास केंद्रित हो सकती है।
विकासशील देशों का संदर्भ: भारत और अफ्रीका
भारत जैसे देश में, जहां जाति, लिंग और धर्म के आधार पर गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानताएं हैं, यूबीआई को एक समावेशी और गैर-भेदभावपूर्ण उपकरण के रूप में देखा जा सकता है। यह सीधे महिलाओं के बैंक खातों में पैसा पहुंचाकर उनकी आर्थिक एजेंसी को मजबूत कर सकता है, जो एक पितृसत्तात्मक समाज में बड़ा बदलाव होगा। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने इस दिशा में चर्चा शुरू भी की है। अफ्रीका के कई हिस्सों में, जहां अनौपचारिक अर्थव्यवस्था बड़ी है और सामाजिक सुरक्षा का ढांचा कमजोर है, यूबीआई गरीबी से निपटने और आर्थिक लचीलापन बढ़ाने का एक व्यावहारिक रास्ता दिखाई देता है, जैसा कि केन्या के प्रयोग से पता चलता है।
उत्तरी यूरोप का कल्याणकारी राज्य मॉडल
स्वीडन, नॉर्वे, और डेनमार्क जैसे देश पहले से ही मजबूत सार्वभौमिक कल्याणकारी सेवाएं (स्वास्थ्य, शिक्षा) प्रदान करते हैं। वहां यूबीआई की बहस मौजूदा प्रणाली को सरल बनाने और डिजिटल युग में उसके स्थायित्व को सुनिश्चित करने के इर्द-गिर्द घूमती है। फिनलैंड का प्रयोग इसी सोच का हिस्सा था। इन समाजों में सामाजिक एकजुटता और सरकार में विश्वास का उच्च स्तर यूबीआई जैसे सार्वभौमिक कार्यक्रमों के लिए अनुकूल माहौल बनाता है।
भारत में यूबीआई: संभावनाएं और चुनौतियां
भारत में यूबीआई की चर्चा आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम द्वारा प्रस्तावित ‘सार्वभौमिक बेसिक आय’ के विचार के साथ तेज हुई। इसे ‘जेएएम (जन धन-आधार-मोबाइल) ट्रिनिटी’ की सफलता के आलोक में देखा गया, जिसने वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया।
भारत के लिए लाभ
- लक्ष्यीकरण की समस्या का समाधान: PDS, MNREGA, और विभिन्न सब्सिडी में होने वाले रिसाव और भ्रष्टाचार से बचा जा सकता है।
- महिला सशक्तिकरण: सीधे महिलाओं के खाते में पैसा आने से घर के अंदर आर्थिक निर्णय लेने की उनकी शक्ति बढ़ेगी।
- शहरीकरण और श्रम गतिशीलता: ग्रामीण प्रवासियों को शहरों में जाकर काम तलाशने के लिए एक वित्तीय सुरक्षा कवच मिलेगा।
- सामाजिक सुरक्षा का विस्तार: भारत की विशाल अनौपचारिक कामगार आबादी (लगभग 90%), जो किसी भी सामाजिक सुरक्षा से वंचित है, को लाभ मिलेगा।
भारत के सामने चुनौतियां
- वित्त पोषण: यह सबसे बड़ी चुनौती है। इसके लिए कई मौजूदा सब्सिडी को खत्म करना, कर सुधार करना, या नए कर लगाने की आवश्यकता होगी। वित्त आयोग और नITI आयोग ने इस पर विस्तृत रिपोर्टें तैयार की हैं।
- राजनीतिक स्वीकार्यता: ‘मुफ्त की रेवड़ियां’ जैसी राजनीतिक बहस और कल्याणकारी योजनाओं को खत्म करने का विरोध एक बड़ी बाधा है।
- मुद्रास्फीति का जोखिम: एक बड़ी आबादी में अचानक क्रय शक्ति का इंजेक्शन स्थानीय बाजारों में कीमतों को बढ़ा सकता है।
- बैंकिंग अवसंरचना: हालांकि जन धन योजना से खाते खुले हैं, लेकिन नियमित लेनदेन और संचालन की चुनौती बनी हुई है।
भविष्य का रास्ता: हाइब्रिड मॉडल और तकनीकी एकीकरण
भविष्य में, पूर्ण सार्वभौमिक बेसिक इनकम के बजाय हाइब्रिड मॉडल अधिक व्यवहार्य हो सकते हैं। इनमें नकारात्मक आयकर, सार्वभौमिक बेसिक सेवाएं (यूबीएस), या लक्षित समूहों के लिए निःशर्त हस्तांतरण शामिल हो सकते हैं। ब्लॉकचेन तकनीक और डिजिटल आईडी (जैसे भारत का आधार) सीधे और पारदर्शी भुगतान की सुविधा दे सकते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बड़ा डेटा (Big Data) सामाजिक जरूरतों का बेहतर आकलन करने में मदद कर सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG), विशेष रूप से लक्ष्य 1 (गरीबी उन्मूलन) और 10 (असमानता कम करना), को प्राप्त करने में यूबीआई एक संभावित उपकरण के रूप में उभर रहा है।
निष्कर्ष: एक बदलती दुनिया के लिए एक प्राचीन विचार
सार्वभौमिक बेसिक इनकम कोई नया विचार नहीं है, लेकिन वैश्वीकरण, डिजिटलीकरण, और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न नई चुनौतियों ने इसे फिर से प्रासंगिक बना दिया है। विभिन्न देशों के प्रयोग बताते हैं कि इसके कई सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव हो सकते हैं, खासकर गरीबी कम करने और मानव क्षमता बढ़ाने में। हालांकि, इसकी डिजाइन, वित्त पोषण और कार्यान्वयन को प्रत्येक देश की विशिष्ट सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप ढालना होगा। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए, यह एक जटिल लेकिन गहन बहस है, जिसका परिणाम भविष्य के सामाजिक ढांचे को निर्धारित कर सकता है।
FAQ
सार्वभौमिक बेसिक इनकम और न्यूनतम आय गारंटी में क्या अंतर है?
सार्वभौमिक बेसिक इनकम (यूबीआई) सभी नागरिकों को बिना किसी शर्त के दी जाने वाली एक समान राशि है, चाहे उनकी आय या संपत्ति कुछ भी हो। न्यूनतम आय गारंटी (Minimum Income Guarantee) एक लक्षित कार्यक्रम है, जो केवल उन लोगों को सहायता देता है जिनकी आय एक निश्चित स्तर से कम है। यूबीआई सार्वभौमिक है, जबकि न्यूनतम आय गारंटी साधन-परीक्षण (means-tested) पर आधारित है।
क्या यूबीआई लोगों को काम करने से रोकेगा?
अधिकांश वास्तविक प्रयोगों (फिनलैंड, केन्या, कनाडा) से यह साबित नहीं हुआ है। लोगों ने काम करना जारी रखा। हां, कुछ विशेष समूहों (जैसे नए माता-पिता, युवा छात्र) ने काम के घंटे कम किए ताकि वे शिक्षा या देखभाल जैसे अन्य महत्वपूर्ण कार्यों पर ध्यान दे सकें। कुल मिलाकर, रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव नगण्य पाया गया है।
भारत जैसे गरीब देश यूबीआई का खर्च कैसे उठा सकते हैं?
यह सबसे बड़ी चुनौती है। वित्तपोषण के स्रोतों में मौजूदा सब्सिडी (खाद्य, उर्वरक, ईंधन) का रिसाव रोककर बचाया गया धन, कर सुधार (जीएसटी जैसे), धनवानों पर अतिरिक्त कर (वेल्थ टैक्स), या प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त राजस्व शामिल हो सकते हैं। इसे एक साथ नहीं, बल्कि चरणबद्ध तरीके से और पायलट प्रोजेक्ट के आधार पर लागू किया जा सकता है।
क्या यूबीआई महंगाई (मुद्रास्फीति) नहीं बढ़ाएगा?
यह एक वाजिब चिंता है। अगर अर्थव्यवस्था की वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति स्थिर रहती है, और अचानक मांग बढ़ जाती है, तो कीमतें बढ़ सकती हैं। हालांकि, अगर यूबीआई धीरे-धीरे लागू किया जाए और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के उपायों (जैसे बुनियादी ढांचे में निवेश) के साथ जोड़ा जाए, तो इस जोखिम को कम किया जा सकता है। केन्या और भारत के प्रयोगों में भारी मुद्रास्फीति नहीं देखी गई।
क्या दुनिया का कोई देश पूर्ण यूबीआई लागू कर रहा है?
अभी तक किसी भी देश ने राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ण, निःशर्त यूबीआई नहीं लागू किया है। हालांकि, ईरान का सब्सिडी नकदीकरण कार्यक्रम यूबीआई के सब
ISSUED BY THE EDITORIAL TEAM
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