जलवायु परिवर्तन की वैज्ञानिक आधारशिला: ग्रीनहाउस प्रभाव क्या है?
पृथ्वी का वायुमंडल एक प्राकृतिक कंबल की तरह कार्य करता है, जो सूर्य से आने वाली ऊर्जा को फँसाकर ग्रह को रहने योग्य तापमान प्रदान करता है। इस प्रक्रिया को प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव कहते हैं। यह प्रभाव मुख्य रूप से कुछ गैसों की उपस्थिति के कारण संभव होता है, जिन्हें ग्रीनहाउस गैसें (Greenhouse Gases – GHGs) कहा जाता है। इनमें कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), और जलवाष्प प्रमुख हैं। ये गैसें सूर्य के प्रकाश को तो गुजरने देती हैं, लेकिन पृथ्वी की सतह से वापस परावर्तित होने वाली अवरक्त (इन्फ्रारेड) किरणों का एक हिस्सा अवशोषित कर लेती हैं, जिससे वायुमंडल गर्म हो जाता है।
समस्या तब उत्पन्न हुई जब मानवीय गतिविधियों, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस) के जलने, वनों की कटाई, और औद्योगिक प्रक्रियाओं के कारण वायुमंडल में इन गैसों की सघनता बेतहाशा बढ़ने लगी। अंतरसरकारी पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के अनुसार, वायुमंडल में CO2 की सांद्रता वर्ष 2023 में 420 पार्ट्स पर मिलियन (ppm) तक पहुँच गई, जो पूर्व-औद्योगिक स्तर (लगभग 280 ppm) से लगभग 50% अधिक है। यह वृद्धि मुख्य रूप से औद्योगिक क्रांति (लगभग 1750) के बाद से हुई है।
मुख्य ग्रीनहाउस गैसें और उनके स्रोत
प्रत्येक ग्रीनहाउस गैस की वायुमंडल में रहने की अवधि और गर्मी को रोकने की क्षमता अलग-अलग होती है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP) कहते हैं।
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO2): यह सबसे प्रचुर मानवजनित ग्रीनहाउस गैस है। इसके मुख्य स्रोत हैं जीवाश्म ईंधन का दहन, सीमेंट उत्पादन, और वनों की कटाई। यह वायुमंडल में सैकड़ों से हजारों वर्षों तक रह सकती है।
- मीथेन (CH4): CO2 की तुलना में इसका GWP लगभग 28-36 गुना अधिक है (100 वर्ष की अवधि में)। इसके स्रोतों में पशुधन (गायों के पाचन), धान के खेत, लैंडफिल साइट्स, और प्राकृतिक गैस के उत्पादन एवं परिवहन में रिसाव शामिल हैं।
- नाइट्रस ऑक्साइड (N2O): इसका GWP CO2 से लगभग 265-298 गुना अधिक है। इसका प्रमुख स्रोत कृषि में रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग और औद्योगिक गतिविधियाँ हैं।
- फ्लोरिनेटेड गैसें: ये पूरी तरह मानवनिर्मित गैसें हैं, जैसे हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs), जिनका उपयोग प्रशीतक (रेफ्रिजरेंट) और एयर कंडीशनर में होता है। इनका GWP हजारों गुना तक हो सकता है।
मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) क्षेत्र: एक जलवायु संवेदनशील हॉटस्पॉट
मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) क्षेत्र दुनिया के सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। विश्व बैंक की रिपोर्टों के अनुसार, यह क्षेत्र पहले से ही अत्यधिक जल संकट, विस्तृत मरुस्थलीकरण, और उच्च तापमान वाला क्षेत्र है, और जलवायु परिवर्तन इन चुनौतियों को और बढ़ा रहा है। क्षेत्र में औसत तापमान वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी दर से बढ़ रहा है। यहाँ के देश, जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ईरान, इराक, जॉर्डन, लेबनान, मिस्र, मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, और यमन, विभिन्न प्रकार के जलवायु प्रभावों का सामना कर रहे हैं।
क्षेत्रीय जलवायु की विशेषताएँ और भेद्यता
MENA क्षेत्र की भौगोलिक और जलवायवीय स्थितियाँ इसे विशेष रूप से संवेदनशील बनाती हैं। अधिकांश क्षेत्र शुष्क या अर्ध-शुष्क है, जहाँ वार्षिक वर्षा 200 मिलीमीटर से कम है। सहारा मरुस्थल, अरबी मरुस्थल, और लुत मरुस्थल जैसे विशाल रेगिस्तान यहाँ फैले हैं। क्षेत्र की अर्थव्यवस्था अक्सर जीवाश्म ईंधन निर्यात (ओपेक के कई सदस्य यहीं हैं) और जल-सघन कृषि पर निर्भर है, जो दोनों ही जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होते हैं।
मापने योग्य प्रभाव 1: तापमान में चरम वृद्धि और गर्मी की लहरें
MENA क्षेत्र में तापमान वृद्धि एक स्पष्ट और मापने योग्य वास्तविकता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के आँकड़े बताते हैं कि पिछले तीन दशकों में यह क्षेत्र दुनिया के सबसे तेजी से गर्म हो रहे क्षेत्रों में शामिल रहा है।
- कुवैत के मित्रिबाह में जुलाई 2016 में तापमान 54.0°C (129.2°F) दर्ज किया गया, जो पूर्वी गोलार्ध में अब तक का सबसे अधिक प्रमाणित तापमान है।
- ईरान के खुज़ेस्तान प्रांत में 2021 में तापमान 53.6°C तक पहुँच गया, जिससे बड़े पैमाने पर बिजली कटौती हुई।
- संयुक्त अरब अमीरात और ओमान में गर्मी की लहरों की आवृत्ति और तीव्रता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
इन गर्मी की लहरों का मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, जिससे हीटस्ट्रोक, निर्जलीकरण, और हृदय एवं श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। यह श्रम उत्पादकता को भी कम करती हैं, विशेष रूप से बाहरी कार्यों में लगे लोगों के लिए। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक गर्मी के कारण काम के घंटों का नुकसान विश्व स्तर पर 2% से अधिक हो सकता है, और MENA क्षेत्र में यह प्रभाव सबसे अधिक होगा।
मापने योग्य प्रभाव 2: जल संकट का गहराता जाना
जलवायु परिवर्तन का MENA क्षेत्र पर सबसे विनाशकारी प्रभाव पानी की उपलब्धता पर पड़ रहा है। यह क्षेत्र पहले से ही दुनिया की सबसे कम नवीकरणीय जल संसाधन वाला क्षेत्र है, और गर्मी बढ़ने से वाष्पीकरण की दर बढ़ रही है, वर्षा के पैटर्न बदल रहे हैं, और सूखे की घटनाएँ बार-बार और लंबी हो रही हैं।
- नाइल नदी और टाइग्रिस-यूफ्रेट्स नदी प्रणाली जैसे प्रमुख जल स्रोतों पर दबाव बढ़ रहा है। इथियोपिया में ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां डैम के निर्माण से नील नदी के जल को लेकर मिस्र और सूडान के साथ तनाव पैदा हुआ है।
- ईरान का उर्मिया झील, कभी दुनिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झीलों में से एक, सूखे और अत्यधिक पानी के दोहन के कारण सिकुड़कर अपने मूल आकार का 10% रह गई है।
- जॉर्डन दुनिया के सबसे अधिक जल-संकटग्रस्त देशों में से एक है। जॉर्डन नदी का प्रवाह ऐतिहासिक स्तरों की तुलना में बहुत कम हो गया है।
इस संकट से निपटने के लिए क्षेत्र के कई देश महंगे विलवणीकरण (डिसैलिनेशन) संयंत्रों पर निर्भर हो रहे हैं, जैसे सऊदी अरब का रास अल-खैर संयंत्र (दुनिया के सबसे बड़े विलवणीकरण संयंत्रों में से एक)। हालाँकि, ये संयंत्र भारी मात्रा में ऊर्जा खपत करते हैं और अक्सर जीवाश्म ईंधन पर चलते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन की समस्या और बढ़ती है।
मापने योग्य प्रभाव 3: कृषि उत्पादकता में गिरावट और खाद्य सुरक्षा खतरे में
बढ़ता तापमान, पानी की कमी, और मिट्टी की नमी में कमी का सीधा असर कृषि पर पड़ रहा है। MENA क्षेत्र पहले से ही दुनिया का सबसे बड़ा अनाज आयातक है, और जलवायु परिवर्तन इसकी खाद्य सुरक्षा को और जोखिम में डाल रहा है।
| देश/क्षेत्र | प्रभावित फसल | अनुमानित उत्पादन में कमी (वर्तमान रुझानों के आधार पर) | संबंधित जोखिम |
|---|---|---|---|
| मिस्र (नील डेल्टा) | गेहूँ, चावल, कपास | 15-20% तक (2100 तक) | समुद्र के जलस्तर में वृद्धि से लवणता बढ़ना |
| मोरक्को | जौ, गेहूँ, जैतून | 10-30% (सूखे की गंभीरता पर निर्भर) | अनियमित वर्षा और सूखा |
| इराक (मेसोपोटामिया) | खजूर, गेहूँ, जौ | गंभीर कमी (पानी की उपलब्धता में कमी के कारण) | टाइग्रिस-यूफ्रेट्स बेसिन में जल प्रवाह कम होना |
| सूडान | सोरघम, बाजरा | विविधता पर निर्भर | मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण |
| यमन | कत (Qat), अनाज | अनिश्चित, लेकिन गंभीर जोखिम | पूर्ण जल संसाधन समाप्ति का खतरा |
इसके अलावा, मत्स्य पालन भी प्रभावित हो रहा है। ओमान की खाड़ी और लाल सागर के जल के गर्म होने से मछलियों के प्रवास के पैटर्न बदल रहे हैं और प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ्स) को नुकसान पहुँच रहा है, जो मछली पकड़ने के लिए महत्वपूर्ण नर्सरी हैं।
मापने योग्य प्रभाव 4: समुद्र के स्तर में वृद्धि और तटीय क्षरण
वैश्विक समुद्र स्तर में वृद्धि, ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों के पिघलने और समुद्र के गर्म होने से जल के विस्तार के कारण हो रही है। MENA क्षेत्र की लंबी तटरेखा और घनी आबादी वाले तटीय शहर इससे गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। नासा के सी लेवल चेंज डेटा के अनुसार, वैश्विक औसत समुद्र स्तर लगभग 3.3 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है, और यह दर बढ़ती जा रही है।
- मिस्र का नील डेल्टा: यह देश की लगभग दो-तिहाई कृषि भूमि का स्रोत और 40% से अधिक आबादी का घर है। यह क्षेत्र समुद्र स्तर वृद्धि और लवणीय जल के अंतर्घुसण (साल्टवॉटर इंट्रूजन) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। अलेक्जेंड्रिया और पोर्ट सईद जैसे प्रमुख शहर जोखिम में हैं।
- कतर, संयुक्त अरब अमीरात, और बहरीन: ये निम्न-ऊँचाई वाले देश हैं, जहाँ महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा, जैसे दोहा का हवाई अड्डा, दुबई के तटीय क्षेत्र, और बहरीन की राजधानी मनामा, जलमग्न होने के खतरे का सामना कर रहे हैं।
- ट्यूनीशिया और लीबिया के तटीय शहर भी तटीय क्षरण और बाढ़ के बढ़ते जोखिम से प्रभावित हैं।
मापने योग्य प्रभाव 5: चरम मौसमी घटनाओं में वृद्धि और बाढ़
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के पैटर्न अधिक अराजक हो रहे हैं। जहाँ एक ओर सूखा बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर अचानक भारी वर्षा और बाढ़ की घटनाएँ भी बढ़ रही हैं, क्योंकि गर्म वायुमंडल में अधिक नमी धारण करने की क्षमता होती है।
- मार्च-अप्रैल 2022 में, यूएई और ओमान में भारी बारिश से व्यापक बाढ़ आई, जिसमें दर्जनों लोगों की मौत हुई।
- जनवरी 2022 में, सऊदी अरब के जेद्दाह शहर में अचानक आई बाढ़ से भारी नुकसान हुआ।
- 2023 में, लीबिया के डर्ना शहर में तूफान डेनियल के कारण आई विनाशकारी बाढ़ ने दो बाँधों को तोड़ दिया, जिससे हजारों लोगों की जान चली गई। यह घटना जलवायु परिवर्तन और कमजोर बुनियादी ढाँचे के घातक संयोग का उदाहरण है।
- यमन और सोमालिया में चक्रवातों (जैसे चक्रवात चापाला 2015) की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि देखी गई है।
मापने योग्य प्रभाव 6: सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और विस्थापन
जलवायु परिवर्तन के भौतिक प्रभाव सामाजिक अस्थिरता, आर्थिक नुकसान और मानवीय विस्थापन का कारण बन रहे हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण MENA क्षेत्र में 2050 तक लगभग 1.4 करोड़ लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हो सकते हैं।
- सीरिया: 2006-2010 के बीच आए ऐतिहासिक सूखे (जिसे जलवायु परिवर्तन से जोड़ा गया है) ने ग्रामीण आजीविका को नष्ट कर दिया, जिससे बड़े पैमाने पर ग्रामीण-शहरी प्रवासन हुआ और सामाजिक तनाव बढ़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि इसने 2011 में शुरू हुए संघर्ष के लिए पृष्ठभूमि तैयार करने में भूमिका निभाई।
- सूडान के डारफुर क्षेत्र में संसाधनों, विशेष रूप से पानी और चरागाह भूमि के लिए संघर्ष बढ़ रहा है, जिसे जलवायु परिवर्तन ने और तीव्र किया है।
- आर्थिक नुकसान: पर्यटन (जैसे मोरक्को और ट्यूनीशिया में), कृषि, और बीमा क्षेत्र पर जलवायु संबंधी आपदाओं का भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएँ और अनुकूलन रणनीतियाँ
MENA देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए विभिन्न अनुकूलन और शमन रणनीतियाँ अपना रहे हैं, हालाँकि चुनौतियाँ अभी भी बहुत बड़ी हैं।
अनुकूलन (Adaptation) के प्रयास
- जल प्रबंधन: इजराइल ने अत्याधुनिक ड्रिप सिंचाई, जल पुनर्चक्रण (85% से अधिक अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग), और नमक-सहिष्णु फसलों के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई है। अल अजहर विश्वविद्यालय और काहिरा विश्वविद्यालय जैसे संस्थान जलवायु-स्मार्ट कृषि पर शोध कर रहे हैं।
- शहरी नियोजन: दुबई और अबू धाबी में एस्टीधामा रेटिंग सिस्टम जैसे हरित भवन मानकों को लागू किया जा रहा है। सऊदी अरब अपने नेओम और द रेड सी प्रोजेक्ट जैसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में जलवायु अनुकूलन को केंद्र में रख रहा है।
- पर्यावरण पुनर्स्थापना: सऊदी अरब का सऊदी ग्रीन इनिशिएटिव और मध्य पूर्व ग्रीन इनिशिएटिव अरब प्रायद्वीप में वनीकरण और भूमि क्षरण को रोकने के लक्ष्य रखते हैं। संयुक्त अरब अमीरात में मैंग्रोव रोपण को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो कार्बन अवशोषित करते हैं और तटों की रक्षा करते हैं।
शमन (Mitigation) के प्रयास
- नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश: तेल-समृद्ध देश भी ऊर्जा विविधीकरण कर रहे हैं। मोरक्को का नूर उवर्ज़ाज़ाट सोलर कॉम्प्लेक्स दुनिया के सबसे बड़े केंद्रित सौर ऊर्जा संयंत्रों में से एक है। संयुक्त अरब अमीरात ने बराकह न्यूक्लियर पावर प्लांट चालू किया है और मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम सोलर पार्क का विस्तार कर रहा है। सऊदी अरब नेओम में हरित हाइड्रोजन उत्पादन पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
- कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CCS): अबू धाबी में एमिरेट्स स्टील इंडस्ट्रीज के साथ अल रेय्याह कार्बन कैप्चर यूनिट जैसी परियोजनाएँ चल रही हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय समझौते: सभी MENA देशों ने पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं और अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) प्रस्तुत किए हैं, हालाँकि इनकी महत्वाकांक्षा के स्तर में अंतर है।
भविष्य की दिशा और महत्वपूर्ण चुनौतियाँ
MENA क्षेत्र के सामने भविष्य की सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं: जल संसाधनों का सतत प्रबंधन, खाद्य उत्पादन प्रणालियों का जलवायु के प्रति लचीला बनाना, तटीय क्षेत्रों की रक्षा करना, और एक ऐसी अर्थव्यवस्था में संक्रमण जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करे। इसके लिए अत्यधिक निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, क्षमता निर्माण, और क्षेत्रीय सहयोग (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC), अरब लीग के माध्यम से) की आवश्यकता होगी। मिस्र में आयोजित COP27 (2022) और संयुक्त अरब अमीरात में आयोजित COP28 (2023) ने इस क्षेत्र में जलवायु कार्रवाई के महत्व को वैश्विक मंच पर रेखांकित किया।
FAQ
प्रश्न: क्या मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में जलवायु परिवर्तन मुख्य रूप से प्राकृतिक है या मानवजनित?
उत्तर: वर्तमान में देखे जा रहे तेजी से जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियाँ जिम्मेदार हैं। प्राकृतिक कारकों (जैसे सूर्य की चक्रीय गतिविधि, ज्वालामुखी) का प्रभाव बहुत कम है। IPCC की छठी आकलन रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वैश्विक तापमान वृद्धि के लिए “मानव प्रभाव निर्विवाद रूप से जिम्मेदार” है। MENA क्षेत्र में यह प्रभाव और भी तीव्र है।
प्रश्न: क्या इस क्षेत्र के तेल उत्पादक देश जलवायु परिवर्तन में योगदान देने वाले हैं, और क्या वे इससे निपटने के लिए कार्रवाई कर रहे हैं?
उत्तर: हाँ, सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश ऐतिहासिक रूप से प्रति व्यक्ति उच्चतम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में से हैं, मुख्यतः तेल और गैस उत्पादन के कारण। हालाँकि, अब ये देश भी कार्रवाई कर रहे हैं। वे नवीकरणी
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